Sunday, 12 January 2014

"औपचारिक" शब्द मुझे अनावश्यक सा लगता है

कभी कभी "औपचारिक" शब्द मुझे अनावश्यक सा लगता है, कभी कभी बेहद जरुरी क्रिया और कभी कभी गहन शोध का विषय,, समाज सञ्चालन में इसकी भूमिका कभी संदिग्ध सी लगती है और कभी महत्त्वपूर्ण,, फिर भी ये क्रिया या क्रियाओं का समूह कभी अपनी महत्ता को पूर्ण रूप से सिद्ध नहीं कर पाया,, जैसे कई बार धोके में आविष्कार हो जाते हैं फिर सिद्धांत की खोज की जाती है, वैज्ञानिक जिंदगी भर समझता है कि उसने अविष्कार किया लेकिन सच में उसने अविष्कार के पीछे का सिद्धांत ढूंढने में ज्यादा वक़्त लगाया ताकि पूछने पर बता सके कि उसने यह कैसे बनाया,, और अगली पीढ़ी के अध्ययन हेतु सामग्री उपलब्ध हो सके,, अगर वैज्ञानिक ठीक से समझा पाया तो ठीक वरना शोध जारी रहेगा,, कहीं कहीं औपचारिकताओं का जन्म भी कुछ खास उद्देश्यों कि पूर्ती के लिए धोखे में हुआ उस खास वक़्त की जरूरतों को पूरा करने के लिए हुआ, इनके निर्माण की थ्योरी नहीं लिखी गयी इसलिए विोधाभास पैदा हुए और चापलूसों, गुलामों, पीड़ितों, दलितों, राजाओं, बजीरों, सैनिकों कि भाव भंगिमाओं और क्रियाओं को औपचारिकता की क्रिया मान लिया गया, मसलन काम निकालना है, नोकरी बचाना है तो चापलूसों कि तरह हरकत करो, विरोध मत करो. क्षमता नहीं है लेकिन फिर भी सम्मान पाना है तो राजा कि तरह अकड़ कर रहो इत्यादि, ये जरूरतें मौखिक रूप से संस्कारों के रूप में प्रवाहित होती चली गयी और कालांतर में औपचारिकतायें बन गयी,, सच्चा प्रेम सच्ची श्रद्धा आज भी औचारिक्ताओं का विरोध ही करता है जहाँ सच नहीं है वहाँ औचारिकता है, ये सच को छुपाने का उपाय है,, सच को छुपाने के लिए की जाने वाली क्रिया है औपचारिकता, हाँ अब ये बात अलग है कि हमारे दैनिक क्रियाकलापों में ये क्रिया इतनी घुल मिल गयी है कि "इस औपचारिकता कि क्या जरुरत थी" कहना भी एक औपचारिकता ही लगती है

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