बीते बीस सालों में मथुरा और वृंदावन दोनों का
काफी विस्तार हो चुका है और जारी है, जैसे बाक़ी शहरों का हो रहा है, अलग
जैसा कुछ नहीं है "जन्म भूमि" मंदिर और "बांके बिहारी" मंदिर में जो
दैवीय सुकून मिलता है वो नए बने किसी कमर्शियल मंदिर में नहीं मिलता आप बनावट और ख़ूबसूरती से भले ही प्रभावित हो जायें लेकिन कृष्ण से जोड़ दे ऐसी कोई नई जगह नहीं, जैसे परदेश में घर के जैसी दिखने वाली जगह आँखे नम कर देती है,,बेहद सुख देती है लेकिन अपने शहर में अपने घर का कोई विकल्प नहीं होता, मूर्तियों से ज्यादा दान पेटियां और सबके अलग नाम, दूध, दही, रवड़ी और पेड़े की पुरानी दुकानें पुराने शहर की शक़्ल पहचानने में मदद करती हैं, हर धर्मशालाओं कि जगह होटल्स ने लेली है, और हद तो ये कि लोगो को अपने घर के बाहर लिखना पड़ रहा है कि ये होटल नहीं है घर है,,,! शोरूम, मॉल की तरह नए मंदिर बन रहे हैं, कृष्ण हर मंदिर में अलग रंग- रूप. अलग नाम, अलग श्रृंगार में भक्तों के स्वागत के लिए खड़े नजर आते हैं, कृष्ण मॉडल बन गए से लगते हैं, कृष्ण का यूज़ हो रहा है,, में सुबह ६ बजे पहुच गया था बाजार ८.३० पर मंदिर के साथ खुला, बाजार और मंदिर एक साथ खुला, ये सही नहीं लगा,, खैर हाथी घोडा पालकी जय कन्हैया लाल की..
दैवीय सुकून मिलता है वो नए बने किसी कमर्शियल मंदिर में नहीं मिलता आप बनावट और ख़ूबसूरती से भले ही प्रभावित हो जायें लेकिन कृष्ण से जोड़ दे ऐसी कोई नई जगह नहीं, जैसे परदेश में घर के जैसी दिखने वाली जगह आँखे नम कर देती है,,बेहद सुख देती है लेकिन अपने शहर में अपने घर का कोई विकल्प नहीं होता, मूर्तियों से ज्यादा दान पेटियां और सबके अलग नाम, दूध, दही, रवड़ी और पेड़े की पुरानी दुकानें पुराने शहर की शक़्ल पहचानने में मदद करती हैं, हर धर्मशालाओं कि जगह होटल्स ने लेली है, और हद तो ये कि लोगो को अपने घर के बाहर लिखना पड़ रहा है कि ये होटल नहीं है घर है,,,! शोरूम, मॉल की तरह नए मंदिर बन रहे हैं, कृष्ण हर मंदिर में अलग रंग- रूप. अलग नाम, अलग श्रृंगार में भक्तों के स्वागत के लिए खड़े नजर आते हैं, कृष्ण मॉडल बन गए से लगते हैं, कृष्ण का यूज़ हो रहा है,, में सुबह ६ बजे पहुच गया था बाजार ८.३० पर मंदिर के साथ खुला, बाजार और मंदिर एक साथ खुला, ये सही नहीं लगा,, खैर हाथी घोडा पालकी जय कन्हैया लाल की..

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